क्या टेस्ट क्रिकेट के अस्तित्व को बचाने के लिए शुरु किया गया Pink Ball टेस्ट मैच, जानिए क्या है इसका इतिहास ?


Mayank Kumar

आज जिस खेल को दुनियाभर में फुटबॉल के बाद लोकप्रियता मिली है, वो है क्रिकेट। ये खेल एक तरह से बीमारी है जो यूरोप और अफ्रीका से ज्यादा दक्षिण एशिया में बसे लोगों को लग जाती है।  अगर यह बीमारी किसी खिलाड़ी को लगे तो वो महान बन जाता है और अगर दर्शकों को लगे तो इसके आगे सारे खेल फीके पड़ जाते हैं। क्रिकेट एक ऐसा खेल है जिसे हर वर्ग और उम्र के लोग सहजता और सरलता से समझकर अपना लेते हैं। 

17वीं शताब्दी की शुरुआत में ये खेल बच्चों के खेलने के लिए जाना जाता था लेकिन बाद में बड़े लोगों की भी इसमें भागीदारी बढने लगी। कहा जाता है कि शुरुआत में क्रिकेट भेड़ के चारागाह या इसके किनारे खेला जाता था। उस समय भेड़ के ऊन के गोले (पत्थर या उलझे हुए ऊन के छोटे गोले) को गेंद के रूप में और छड़ी या अंकुनी या अन्य कृषि औजार को बल्ले के रूप में तथा स्टूल या पेड़ को स्टंप के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। 

क्रिकेट की शुरुआत अंग्रेजो के द्वारा की गई थी और जहाँ-जहाँ अंग्रेजों का शासन रहा, वहीं इस खेल को काफी लोकप्रियता भी मिली है। 16वीं शताब्दी में लोग इस खेल को मन बहलाने के लिए आपस में खेला करते थे। क्रिकेट की शुरुआत टेस्ट क्रिकेट से हुई थी लेकिन आज क्रिकेट के तीन फॉर्मेट हैं।  टेस्ट, वनडे और टी20 ।

15 मार्च 1877 से 19 मार्च 1877 तक खेले गए, पहले टेस्ट मैच की गवाह बनी थीं ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड की टीमें, जिन्होंने ऑस्ट्रेलिया के ही मेलबर्न के ऐतिहासिक मैदान पर यह मैच खेल था। इस मैच में ऑस्ट्रेलिया ने 45 रनों से जीत दर्ज की थी। पहले टेस्ट मैच में कोई समय सीमा नहीं थी, इसमें दोनों टीमों ने दो-दो पारियां खेली। ये टेस्ट मैच चार दिनों तक चला था।

पहले के वक्त में यही हुआ करता था, चाहे कितने दिन लगे दोनों टीम को दो-दो पारियां खेलनी होती थी लेकिन धीरे-धीरे टेस्ट क्रिकेट की लोकप्रियता उस समय कम होने लगी जब वनडे क्रिकेट की एंट्री हुई और जब टी20 फॉर्मेट आया तो लोगों ने टेस्ट क्रिकेट से धीरे-धीरे मुंह मोड़ना शुरू कर दिया।    

अब सवाल ये था कि टेस्ट क्रिकेट को बचाया कैसे जाए ? इसके लिए एक तरकीब निकाली गई और वो तरकीब थी पिंक बॉल टेस्ट मैच यानी डे नाइट टेस्ट मैच। 

यह बात साल 2000 की है जब पिंक बॉल (Pink Ball)  टेस्ट पर और डे नाइट टेस्ट पर पहली बार चर्चा हुई थी लेकिन पिंक बॉल (Pink Ball)  से टेस्ट मैच पहली बार साल 2010 में खेला गया था जो अबु धाबी में खेला गया था और इसे काफी पसंद भी किया गया। फिर 2011 में काउंटी क्रिकेट में इसको लाया गया और पहला मैच केंट और ग्लैमोर्गन के बीच खेला गया।

इसके बाद साल  2013-14 में तीन दिन का डे नाइट पिंक बॉल (Pink Ball)  टेस्ट मैच खेला गया और अंत में 27 नवंबर 2015 को ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच एडिलेड में पहला अंतरराष्ट्रीय डे नाइट टेस्ट मैच खेला गया। इसके बाद पिंक बॉल (Pink Ball)  से दूसरा टेस्ट मैच पाकिस्तान और वेस्ट इंडीज के बीच खेला गया और अब तक यह प्रक्रिया जारी है। पिंक बॉल (Pink Ball)  टेस्ट मैच को दुनिया के सभी देशों में पसंद किया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि टेस्ट क्रिकेट के अस्तित्व को बचाने के लिए डे नाइट टेस्ट की शुरुआत हुई है और यह काफी हद तक सही भी है।

अब सवाल यह है कि डे नाइट टेस्ट के लिए गुलाबी गेंद (Pink Ball)  ही क्यों इस्तेमाल किया जाता है ? यह सवाल हर क्रिकेट फैंस के मन में आता है। तो चलिए इसका जवाब भी दिए देते हैं। यह बात कर किसी को मालूम है कि टेस्ट क्रिकेट सफेद जर्सी में खेला जाता है और इसमें लाल रंग की गेंद का इस्तेमाल किया जाता है जबकि वनडे क्रिकेट रंगीन कपड़ों में खेला जाता है और इसमें सफेद गेंद का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि गेंद आसानी से नजर आए।

वहीं, डे नाइट टेस्ट मैच के लिए शुरुआत में पीली और नारंगी जैसी कई रंगों की गेंदों का इस्तेमाल किया गया था लेकिन यह सभी रंग कैमरा फ्रेंडली नहीं थे। मैच कवर कर रहे कैमरामैन को ऑरेंज कलर कैमरे में कैप्चर कर पाना काफी मुश्किल होता था। यह गेंद दिखाई नहीं देती थी। इसके बाद सबकी सहमति से पिंक कलर को चुना गया।

सब कुछ तय हो गया, गुलाबी गेंद पर मुहर लग गई लेकिन यहाँ भी एक परेशानी थी कि पिंक में भी कैसा पिंक कलर हो। इसके लिए करीब पिंक के 16 शेड्स ट्राई किए गए। इस्तेमाल करने के बाद यह देखा गया कि गेंद में बदलाव आ रहा है। अंत में एक आइडियल शेड को चुना गया जिसकी बनी गेंद अब डे-नाइट टेस्ट मैच में इस्तेमाल होती है। अब जब रंग तय हो गया तो परेशानी यह आई कि सिलाई के धागे किस रंग के होंगे। कूकाबूरा कंपनी ने पिंक बॉल की सिलाई सबसे पहले काले रंग के धागे से की थी। फिर हरे रंग का इस्तेमाल हुआ, फिर सफेद कलर के धागे का प्रयोग हुआ। अंत में हरे रंग की सिलाई पर सबकी सहमति बनी।

चलिए अब आपको बताते हैं कि यह गेंद बनती कैसे है। जिस प्रकार से रेड बॉल बनाई जाती है, ठीक उसी प्रकार से पिंक बॉल (Pink Ball)  भी बनाई जाती है।  इन दोनों गेंदों में फर्क बस रंग का होता है।  रेड बॉल में लेदर को लाल रंग से रंग कर उसकी घिसाई की जाती है जबकि गुलाबी गेंद (Pink Ball)  में गुलाबी, लेकिन फिनिशिंग के दौरान पिंक बॉल (Pink Ball)  पर रंग की एक और परत चढ़ाई जाती है जिससे शाइन बरकरार रहती है।

वहीं, बात डे नाइट टेस्ट मैच के टाइमिंग की करें तो पिंक बॉल टेस्ट मैच, वनडे मैच की तरह शुरू होती है। डे नाइट टेस्ट मैच दिन के करीब 3 बजे से शुरू हो जाता है जो रात के करीब 11 बजे तक चलता है। तो ये था पिंक बॉल टेस्ट मैच का इतिहास। 

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