भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की दूसरी पुण्यतिथि पर जाने उनके जीवन और प्रसिद्ध कविताओं के बारे में


Mayank Kumar

आज भारत के पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी की दूसरी पुण्यतिथि है। उनकी दूसरी पुण्यतिथि पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें 'सदैव अटल' स्मारक जाकर श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके अलावा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष  जे.पी.नड्डा ने भी 'सदैव अटल' पर उन्हें श्रद्धांजलि दी। अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि पर उनकी बेटी नमिता कौल भट्टाचार्य और पोती निहारिका ने भी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी आज हमारे बीच नहीं है लेकिन उनके निस्वार्थ समर्पण और पचास से अधिक सालों तक देश और समाज की सेवा करने के लिए 27 मार्च, 2015 को उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। वाजपेयी को साल 1994 में भारत का 'सर्वश्रेष्ठ सांसद' भी चुना गया और उन्हेंभारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया गया था।

अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीति में एंट्री

अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने छात्र जीवन में ही राष्ट्रवादी राजनीति में कदम रख दिया था। उन्होंने साल 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग जरूर लिया था लेकिन उस समय वाजपेयी खुद को आने वाले समय में एक राजनेता के रूप में परख नहीं पाए थे। हालांकि, कहते हैं ना एक जौहरी ही हीरे की परख कर सकते है और समय से बड़ा जौहरी कोई नहीं है। साल 1957 में वाजपेयी ने लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ा और बलरामपुर सीट से उन्हें जीत मिली। 

पहली सरकार मात्र 13 दिन में गिर गई अटल बिहारी वाजपेयी नौ बार लोकसभा के लिए चुने गए, साल 1962 से 1967 और साल 1986 में वो राज्यसभा के सदस्य भी रहे थे। वाजपेयी 1968 से 1973 तक भारतीय जन संघ के अध्यक्ष रहे और भारत के 10वें प्रधानमंत्री भी बने। वाजपेयी तीन बार प्रधानमंत्री बने, पहली बार 16 मई 1996 से 1 जून तक, दूसरी बार 19 मार्च 1998 से 26 अप्रैल 1999 तक और तीसरी बार 13 अक्टूबर 1999 से 22 मई से 2004 तक।

13 दिन के कार्यकाल से लेकर पांच साल तक के कार्यकाल का सफर

16 मई 1996 को जब पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो उनकी सरकार मात्र 13 दिन ही चल पाई।  सरकार के अल्पमत में आने के बाद वाजपेयी को इस्तीफा देना पड़ा था। उसके बाद साल 1998 तक वाजपेयी लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे। 1998 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने गठबंधन की सरकार बनाई और वाजपेयी एक बार फिर प्रधानमंत्री बने लेकिन इस बार भी उनकी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई और 13 महीने में ही गिर गई।

कहानी में ट्विस्ट एक बार फिर आया, अटल बिहारी वाजपेयी साल साल 1999 में तीसरी बार प्रधानमंत्री बने और ये सरकार उन्होंने पूरे पांच साल चलाई।  

पत्रकार अटल बिहारी वाजपेयी की जीवन गाथा

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर, 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा भी उनकी वहीं हुई लेकिन फिर आगे कि पढ़ाई के लिए वाजपेयी ने कानपुर के डीएवी कॉलेज में एडमिशन लिया। यहां से उन्होंने राजनीतिक विज्ञान में MA किया और करियर के लिए पत्रकारिता का चुनाव किया।

वाजपेयी राष्ट्र धर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन के संपादक भी रहे लेकिन नीयति को शायद कुछ और ही मंजूर था। साल 1951 में भारतीय जन संघ की स्थापना हुई। अटल बिहारी वाजपेयी उसके संस्थापक सदस्य बने। इसके बाद उन्होंने पत्रकारिता छोड़ दी लेकिन, पत्रकारिता छोड़ने के बाद भी उन्होंने अपनी कलम को विराम नहीं दिया। अटल बिहारी वाजपेयी ने कई कविताएं लिखीं जो आज भी लोगों के लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं। 

आइए हम आपको अटल बिहारी वाजपेयी की दो प्रमुख और प्रेरणास्त्रोत कविता से रूबरू करवाते हैं:-

1: कदम मिलाकर चलना होगा

1: कदम मिलाकर चलना होगा

कदम मिलाकर चलना होगा,

बाधाएं आती हैं आएं

घिरें प्रलय की घोर घटाएं,

पावों के नीचे अंगारे,

सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,

निज हाथों में हंसते-हंसते,आग लगाकर जलना होगा

कदम मिलाकर चलना होगा

हास्य-रूदन में, तूफानों में,

अगर असंख्यक बलिदानों में,

उद्यानों में, वीरानों में,

अपमानों में, सम्मानों में,

उन्नत मस्तक, उभरा सीना,

पीड़ाओं में पलना होगा,

कदम मिलाकर चलना होगा

उजियारे में, अंधकार में,

कल कहार में, बीच धार में,

घोर घृणा में, पूत प्यार में,

क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,

जीवन के शत-शत आकर्षक,

अरमानों को ढलना होगा,

कदम मिलाकर चलना होगा


सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,

प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,

सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,

असफल, सफल समान मनोरथ,

सब कुछ देकर कुछ न मांगते,पा

बनकर ढलना होगा,

कदम मिलाकर चलना होगा

कुछ कांटों से सज्जित जीवन,

प्रखर प्यार से वंचित यौवन,

नीरवता से मुखरित मधुबन,

परहित अर्पित अपना तन-मन,

जीवन को शत-शत आहुति में,

जलना होगा, गलना होगा,

क़दम मिलाकर चलना होगा

2. बोल(अटल बिहारी वाजपेयी): कवि उदास है, उसके लिखने की इच्छा नहीं है लेकिन फिर भी लिखता है, गीत नहीं गाता हूं,


गीत नहीं गाता हूं,

बेनकाब चेहरे हैं, दाग बड़े गहरे हैं 

टूटता तिलिस्म, आज सच से भय खाता हूं,

गीत नहीं गाता हूं।

लगी कुछ ऐसी नज़र, बिखरा शीशे सा शहर,

अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूं,

गीत नहीं गाता हूं।

बोल(अटल बिहारी वाजपेयी): फिर ये विश्वासघात की कल्पना है।

पीठ मे छुरी सा चांद,

राहू गया रेखा फांद,

मुक्ति के क्षणों में बार-बार बंध जाता हूं,

गीत नहीं गाता हूं,

बोल(अटल बिहारी वाजपेयी): लेकिन परिस्थिति बदली, मनस्थिति बदली, कवि ने कहा, मैं लिखूंगा और कवि ने लिखा, गीत नया गाता हूं,

गीत नया गाता हूं, टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर,

पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर,

झरे सब पीले पात कोयल की कुहुक रात,

प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूं,

गीत नया गाता हूं,

बोल(अटल बिहारी वाजपेयी): इसका अंतिम है,

टूटे हुए सपनों की सुने कौन सिसकी,

अन्तर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी,

हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा,

काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं,

गीत नया गाता हूं।

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