ताशकंद में पकिस्तान से समझौते की बात चल रही थी, जिसके बाद से कभी नहीं लौटे शास्त्री


Purti Agnihotri

आज़ाद भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री, सादगी एवं सरलता की प्रतिमूर्त, जय जवान जय किसान ही नहीं बल्कि ‘राष्ट्र देवो भवः’ का मन्त्र संचारित करने वाले भारत के पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री की पुण्य तिथि पर शत-शत नमन। ऐसे महापुरुष ना पहले कभी हुए थे और ना आगे कभी होंगे। जिन्होंने अपना सर्वस्य देश की खातिर समर्पित कर दिया। 

10 जनवरी 1966 वो दिन जब आखिरी बार अपने घरवालों से बात कर पाए थे शास्त्री जी। सबसे पहले और अंतिम बार उन्होंने अपनी बेटी से बात की, जब उन्होंने बेटी से पूछा समझौता कैसा लगा। जवाब था- अच्छा नहीं। इसके बाद उन्होंने पत्नी से अपने प्रश्न का उत्तर जाने की इच्छा जताई लेकिन उन्होंने फ़ोन का कोई जवाब नहीं दिया। ज़ाहिर था कि वे भी इस फैसले से नाखुश थीं। फैसला था पकिस्तान से समझौते का, उस समय वो ताशकंद में थे जहां पकिस्तान से समझौते की बात चल रही थी।

ऐसी क्या वजह थी कि भयानक युद्ध जीतकर दुनिया के सामने देश की शान बढ़ाने वाले शास्त्री जी ताशकंद समझौते के लिए आखिर राजी हो गए? क्या उनपर कोई अंतर्राष्ट्रीत्य दबाव था?  इससे पहले कि वो इन सभी राजों को दुनिया के सामने खोल कर रखते ताशकंद में उनका देहांत हो गया और उनकी मौत एक राज बनकर रह गयी। 11 जनवरी 1966 एक ऐसा दिन था जिसने देश की काया पलट कर रख दी। ये एक दुर्भाग्य की बात है कि शास्त्री जी की मौत की गुत्थी आज तक नहीं सुलझ पायी।

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